रायगढ़: जनजातीय समाज के अधिकारों और ‘डि-लिस्टिंग’ के मुद्दे पर लंबे समय से मुखर रहे लैलूंगा (रायगढ़) के युवा पूर्व भाजपा नेता रवि भगत ने एक बार फिर इस बहस को राष्ट्रीय और प्रादेशिक स्तर पर गर्मा दिया है। हाल ही में एक वीडियो जारी कर उन्होंने धर्मांतरण के बाद भी अनुसूचित जनजाति (ST) के रूप में राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षण का ‘दोहरा लाभ’ ले रहे नेताओं पर तीखा प्रहार किया है।
झारखंड के सांसद का उदाहरण और लुंड्रा विधायक पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता और भाजपा लीगल सेल के सदस्य अश्विनी उपाध्याय द्वारा साझा की गई एक पोस्ट को आधार बनाते हुए रवि भगत ने इस मुद्दे को छत्तीसगढ़ के परिप्रेक्ष्य में उठाया है। इस पोस्ट में झारखंड के राजमहल से एसटी सीट पर चुनाव जीते सांसद विजय हांसदा की ईसाई रीति-रिवाज से हुई शादी का जिक्र था।
वीडियो में अपने विचार रखते हुए रवि भगत कहते हैं, “आज एक पोस्ट बड़ा वायरल हो रहा है झारखंड के राजमहल से सांसद विजय हसदा जो कि अनुसूचित जनजाति एसटी सीट पर सांसद का चुनाव लड़ के सांसद बने हैं और… स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि वो ईसाई रीति-रिवाज से उनकी शादी हुई है।” इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर चल रही उस बहस का जिक्र किया जिसमें ऐसे जनप्रतिनिधियों को अयोग्य ठहराने की मांग की जा रही है।
इसी क्रम में रवि भगत ने अपनी ही पूर्व पार्टी (भाजपा) के लुंड्रा (छत्तीसगढ़) से वर्तमान विधायक प्रबोध मिंज का सीधा संदर्भ देते हुए एक बड़ा और तीखा सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा, “छत्तीसगढ़ में लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी के एक नेता हैं जो अंबिकापुर के महापौर रहे और वर्तमान में लुंडरा से विधायक हैं… लेकिन वो ईसाई हैं। क्या जिस प्रकार से विजय हसदा के विषय में लोग चर्चा कर रहे हैं… क्या प्रबोध मिंज जी के विषय में भी ऐसी कोई मुहिम चलेगी क्या?”
‘दोहरा लाभ’ लेने वालों की हो डि-लिस्टिंग
रवि भगत का स्पष्ट मानना है कि धर्म परिवर्तन कर चुके व्यक्तियों को अनुसूचित जनजाति के संवैधानिक लाभ, आरक्षण तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व का अधिकार दिए जाने से मूल और वास्तविक आदिवासी समुदाय के अधिकारों का सीधा हनन हो रहा है। उन्होंने अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय सहित आम जनता से आग्रह किया है कि किसी एक व्यक्ति पर चर्चा न करते हुए, ऐसे सभी नेताओं पर टिप्पणी होनी चाहिए जो ईसाई होने के बावजूद आदिवासी सीट से चुनाव लड़कर जनप्रतिनिधि बने हैं।
उन्होंने अपने वीडियो संदेश का समापन एक स्पष्ट और मजबूत मांग के साथ किया: “जो लोग दोहरा लाभ ले रहे हैं, ऐसे सभी व्यक्तियों का डि-लिस्टिंग होना चाहिए।”
आदिवासी अस्मिता और अधिकारों की लड़ाई
रवि भगत का तर्क है कि डि-लिस्टिंग लागू नहीं होने के कारण शिक्षा, रोजगार, छात्रवृत्ति, सरकारी योजनाओं तथा निर्वाचित प्रतिनिधित्व में वास्तविक जनजातीय समाज का हिस्सा लगातार कम होता जा रहा है। इसे उन्होंने आदिवासी अस्मिता, सांस्कृतिक पहचान और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा बेहद गंभीर विषय बताया है और इस पर राष्ट्रीय स्तर पर एक ठोस बहस की आवश्यकता जताई है।
गौरतलब है कि धर्मांतरण के बाद अनुसूचित जनजाति के दर्जे और उससे मिलने वाले लाभों के प्रश्न पर सर्व आदिवासी समाज सहित विभिन्न संगठनों द्वारा समय-समय पर बड़े आंदोलन किए जाते रहे हैं। छत्तीसगढ़ में भी डि-लिस्टिंग की मांग लंबे समय से उठती रही है। रवि भगत द्वारा इस मुद्दे को पुनः मुखरता से उठाने के बाद, आने वाले समय में धर्मांतरण और आदिवासी आरक्षण के विषय पर राजनीतिक व सामाजिक बहस के और अधिक तेज होने की संभावना है।



