अंबिकापुर। ब्यूरो सरगुजा जिला प्रशासन ने मंगलवार को गंगापुर क्षेत्र में शासकीय मेडिकल कॉलेज के लिए आवंटित भूमि पर बड़ी कार्रवाई की। सालों से काबिज अतिक्रमणकारियों को हटाते हुए प्रशासन ने भारी पुलिस बल की मौजूदगी में 37 अवैध मकानों को जमींदोज कर दिया। कार्रवाई के दौरान उस वक्त तनाव की स्थिति निर्मित हो गई जब आक्रोशित कब्जेधारियों ने बुलडोजर पर पथराव कर दिया। पुलिस ने हल्का बल प्रयोग कर स्थिति को नियंत्रित किया और महिलाओं को मौके से हटाकर बेदखली की प्रक्रिया पूरी की।
पथराव से टूटा जेसीबी का कांच, महिलाओं का उग्र विरोध
मंगलवार सुबह जब एसडीएम फागेश सिन्हा और तहसीलदार उमेश बाज के नेतृत्व में नगर निगम और राजस्व की टीम बुलडोजर के साथ गंगापुर पहुंची, तो वहां हड़कंप मच गया। कार्रवाई रोकने के लिए लोग बुलडोजर के सामने लेट गए। इस दौरान कुछ असामाजिक तत्वों ने टीम पर पथराव शुरू कर दिया, जिससे एक जेसीबी का फ्रंट मिरर टूट गया। महिलाओं ने हाथ जोड़कर और रोते हुए कार्रवाई रोकने की गुहार लगाई, लेकिन नोटिस की अवधि समाप्त होने के कारण प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया। महिला पुलिसकर्मियों ने मशक्कत के बाद प्रदर्शनकारियों को सुरक्षित घेरे से बाहर निकाला।
25 साल लंबी कानूनी लड़ाई का अंत
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार, यह विवाद पिछले ढाई दशकों से चला आ रहा था।
- वर्ष 2000: पहली बार 37 कब्जाधारियों को बेदखली का नोटिस जारी हुआ था। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां से दोबारा सुनवाई के निर्देश मिले।
- वर्ष 2025: लंबी सुनवाई के बाद प्रशासन ने फिर से बेदखली का आदेश पारित किया।
- ताजा घटनाक्रम: कब्जाधारी दोबारा हाईकोर्ट पहुंचे थे, लेकिन इस बार न्यायालय ने उनकी याचिका खारिज कर दी। इसके बाद प्रशासन ने एक सप्ताह पूर्व अंतिम अल्टीमेटम दिया था।
7 एकड़ की कीमती जमीन होगी मुक्त
मेडिकल कॉलेज के विस्तार के लिए यह 7 एकड़ जमीन अत्यंत महत्वपूर्ण है। एसडीएम फागेश सिन्हा ने बताया कि कब्जाधारियों को अपना सामान निकालने के लिए पर्याप्त समय दिया गया था, जिसके बाद ध्वस्तीकरण शुरू किया गया। सुरक्षा के मद्देनजर एएसपी अमोलक सिंह के साथ भारी पुलिस बल तैनात रहा।
एकतरफा कार्रवाई का आरोप
दूसरी ओर, पूर्व पार्षद बालकेश्वर तिर्की ने प्रशासन पर एकतरफा कार्रवाई का आरोप लगाया है। उनका दावा है कि क्षेत्र में करीब 60 से 62 मकान हैं और हाईकोर्ट में प्रभावितों का पक्ष ठीक से नहीं रखा गया। बेदखल हुए परिवारों का कहना है कि उनके पास रहने का कोई वैकल्पिक स्थान नहीं है और वे अब खुले आसमान के नीचे झोपड़ी बनाकर रहने को मजबूर हैं।


