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Video: ग्राम सभा का फैसला दरकिनार, अडानी को ज़मीन देने पर आमादा प्रशासन: रायगढ़ मे बड़ा किसान आंदोलन तय!

रायगढ़ : रायगढ़ जिले में उद्योगपति अडानी समूह के लिए ज़मीन अधिग्रहण को लेकर एक बार फिर बड़ा संग्राम छिड़ गया है। ग्राम पंचायत कोतमरा और आसपास के ग्रामीण अपनी पुश्तैनी ज़मीन बचाने के लिए अब आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गए हैं। आगामी 13 जुलाई को होने वाली प्रस्तावित जनसुनवाई का कड़ा विरोध करते हुए ग्रामीणों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर कार्यालय पहुंचकर इसे तत्काल स्थगित करने की मांग की है।

ग्राम सभा का फैसला दरकिनार, प्रशासन पर तानाशाही का आरोप

कोतमरा ग्राम पंचायत के सरपंच अमीन कुमार पटेल ने प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाते हुए बताया कि उनके गांव की 290 एकड़ ज़मीन को अधिग्रहित करने का प्रस्ताव है। इसके विरोध में गांव वाले तीन बार ग्राम सभा की बैठक कर चुके हैं और स्पष्ट रूप से कह चुके हैं कि उन्हें अपनी ज़मीन नहीं देनी है। इसके बावजूद, शासन और प्रशासन ग्रामीणों की आवाज़ को अनसुना कर जबरदस्ती भू-अर्जन करने की कोशिश कर रहा है।

नियम-कानून ताक पर, कॉरपोरेट को फायदा पहुंचाने की होड़

ग्रामीणों का साफ कहना है कि प्रशासन 2013 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम की सरेआम धज्जियां उड़ा रहा है। कानून के मुताबिक, 70 से 80 प्रतिशत किसानों की पूर्व सहमति के बिना भूमि अधिग्रहण नहीं किया जा सकता, लेकिन कलेक्टर और एसडीएम इस नियम को मानने के लिए तैयार नहीं हैं।

सरपंच ने कहा, “सरकार ‘सुशासन’ का त्योहार मना रही है, लेकिन हमारे गांव के 275 से अधिक लोगों ने ज़मीन अधिग्रहण के विरोध में आवेदन दिया है, जिसका आज तक निराकरण नहीं हुआ। सामरी में 19 जून को हुई जनसुनवाई में भी 204 लोगों ने लिखित में अपना विरोध दर्ज कराया था, फिर भी हमारी कोई सुनवाई नहीं हो रही है।”

प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक लगाई गुहार, पर सब मौन

यह लड़ाई केवल स्थानीय प्रशासन तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों ने न्याय की आस में प्रधानमंत्री कार्यालय, राष्ट्रपति कार्यालय, क्षेत्रीय सांसद, सूबे के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और स्थानीय विधायक व पर्यावरण मंत्री ओ.पी. चौधरी तक को आवेदन भेजे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि हर स्तर पर ग्रामीणों की अनदेखी की जा रही है। सरपंच का आरोप है कि शासन-प्रशासन नियम कानूनों को ताक पर रखकर सिर्फ अडानी कंपनी का साथ दे रहा है।

“बरसात न होती तो पूरा गांव कलेक्ट्रेट घेरता”

वर्तमान में बारिश के मौसम को देखते हुए गांव के केवल कुछ प्रतिनिधि ही विरोध दर्ज कराने कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे। लेकिन उन्होंने प्रशासन को खुली चेतावनी दी है कि यदि जनसुनवाई रद्द नहीं की गई और किसानों की ज़मीन जबरन छिनने का प्रयास जारी रहा, तो पूरा का पूरा गांव कलेक्ट्रेट के सामने उग्र धरना प्रदर्शन करेगा।

क्या विकास की कीमत किसानों की ज़मीन है?

एक तरफ सरकारें किसान हितैषी होने का दावा करती हैं, वहीं दूसरी तरफ रायगढ़ के इन ग्रामीणों की चीखें सत्ता के गलियारों में दबकर रह गई हैं। सवाल यह है कि क्या बिना किसानों की सहमति के कॉरपोरेट घरानों को ज़मीन सौंप देना ही असली ‘सुशासन’ है? 13 जुलाई की जनसुनवाई अब महज़ एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि कोतमरा के ग्रामीणों के अस्तित्व की लड़ाई बन चुकी है।