रायगढ़। एक बार फिर रायगढ़ का इतिहास खुद को उसी खौफनाक और क्रूर तरीके से दोहरा रहा है, जहाँ कॉर्पोरेट घरानों की तिजोरियां भरने के लिए किसानों की छाती पर बुलडोजर चलाने की बिसात बिछाई जा रही है। पुसौर ब्लॉक का ग्राम कोतमरा आज प्रशासन और पूंजीपतियों के उसी ‘गेम’ का शिकार हो रहा है। एक तरफ अडानी कंपनी की औद्योगिक हवस है, तो दूसरी तरफ उसके आगे घुटने टेक चुका हमारा जिला प्रशासन। सवाल यह है कि आखिर रायगढ़ की उपजाऊ माटी और कितनी बार छली जाएगी?
13 जुलाई की जनसुनवाई: विकास का मुखौटा या विनाश का षड्यंत्र?
आगामी 13 जुलाई को ग्राम सूपा में अडानी कंपनी को पर्यावरणीय स्वीकृति दिलाने के लिए प्रशासन जनसुनवाई का एक प्रायोजित कार्यक्रम करने जा रहा है। इसके कड़े विरोध में कोतमरा के ग्रामीण और किसान कलेक्टर कार्यालय पहुंचे और स्पष्ट अल्टीमेटम दिया कि इस तथाकथित जनसुनवाई और भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को तत्काल निरस्त किया जाए। लेकिन क्या एसी कमरों में बैठे प्रशासन को अपने ही अन्नदाताओं की चीखें सुनाई दे रही हैं?
ग्राम सभा को ठेंगा, कानूनों की सरेआम हत्या
लोकतंत्र में ग्राम सभा को सबसे ऊपर माना जाता है, लेकिन अडानी के प्रोजेक्ट के आगे शायद प्रशासन ने संविधान भी ताक पर रख दिया है। कोतमरा के ग्रामीणों ने एक नहीं, तीन-तीन बार ग्राम सभा की बैठकों में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया है कि वे अपनी एक इंच भी ज़मीन (निजी या शासकीय) उद्योगों को नहीं देंगे। इसके बावजूद 290 एकड़ उपजाऊ भूमि छीनने की प्रक्रिया बेशर्मी से आगे बढ़ाई जा रही है। भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम 2013 के प्रावधानों और पारदर्शिता की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। बिना प्रभावित परिवारों की सहमति के ज़मीन छीन लेना आखिर कौन सा ‘सुशासन’ है?
सुशासन के नाम पर अन्नदाताओं के आंसुओं से मजाक
प्रशासनिक चौखट पर न्याय की आस में खड़े एक किसान का दर्द छलक पड़ा। उसने रुंधे गले से कहा- “सरकार सुशासन त्योहार मनाती है, लेकिन हमने सुशासन के तहत 275 से अधिक आवेदन दे दिए कि हमें अपनी ज़मीन नहीं देनी है। हम चीख रहे हैं, विरोध कर रहे हैं, लेकिन आज तक ऑनलाइन कोई निराकरण नहीं हुआ।” यह महज़ एक बयान नहीं, बल्कि उस मजबूर किसान की सिसकी है, जिसकी दो-फसली, सिंचित और सोना उगलने वाली ज़मीन को छीनकर उसे बेघर और दर-ब-दर करने की साजिश रची जा रही है। अगर ज़मीन गई, तो सैकड़ों परिवार सड़क पर आ जाएंगे और खेतिहर मजदूरों के सामने पलायन के अलावा कोई चारा नहीं बचेगा।
धुएं और राख में घुटती ‘ज़िंदगी’ का खौफ
रायगढ़ पहले ही औद्योगिक प्रदूषण का भयानक दंश झेल रहा है। किसानों को डर है कि अगर यहाँ अडानी का एक और प्रोजेक्ट लगा, तो उनकी बची-खुची ज़िंदगी भी राख के ढेरों, काली धूल, जहरीले धुएं और पाताल छूते जल स्तर में दफन हो जाएगी। उद्योगों से निकलने वाला जहर न सिर्फ उनकी खेती बर्बाद करेगा, बल्कि उनके बच्चों की सांसों में भी जहर घोल देगा।



