रायगढ़/तमनार: विकास और औद्योगीकरण के नाम पर रायगढ़ जिले के तमनार ब्लॉक में एक बार फिर प्रकृति का बेरहमी से चीरहरण शुरू हो गया है। ग्राम नागरमुड़ा में जिंदल उद्योग को आवंटित प्रस्तावित कोयला खदान के लिए हरे-भरे जंगलों को साफ किया जा रहा है। कॉरपोरेट मुनाफे की इस अंधी दौड़ में प्रशासन ने भी मानो अपनी आंखें मूंद ली हैं। आलम यह है कि सावन की इस झमाझम बारिश के बीच, जहां प्रकृति नया रूप लेती है, वहां नागरमुड़ा के जंगलों में जिंदल उद्योग की आरा मशीनों की चीखें गूंज रही हैं।
जिंदल की मनमानी और ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
स्थानीय ग्रामीणों का आरोप है कि जिंदल उद्योग के अधिकारियों ने अपने कर्मचारियों के माध्यम से जंगल के सफाए का यह क्रूर अभियान शुरू कर दिया है। सदियों से इस जंगल को सहेजने वाले ग्रामीण अब अपनी आंखों के सामने इन पेड़ों को कटता देख आक्रोशित हैं। भारी बारिश के बावजूद ग्रामीण जंगल में पहुंचकर पेड़ों की कटाई का पुरजोर विरोध कर रहे हैं और जिंदल प्रबंधन की इस मनमानी के खिलाफ लामबंद हो गए हैं।
प्रशासनिक मंजूरी या विनाश का लाइसेंस?
जब इस पूरे मामले पर वन विभाग का पक्ष जानने की कोशिश की गई, तो प्रशासन का रवैया भी पूरी तरह से उद्योगपतियों के पक्ष में खड़ा नजर आया। वन विभाग के एसडीओ (SDO) आशुतोष मांडवा ने बेबाकी से यह स्वीकार किया कि ग्राम नागरमुड़ा में जिंदल की प्रस्तावित खदान के लिए विभाग ने 15,537 पेड़ों को काटने की आधिकारिक अनुमति दे दी है। इस कटाई की जद में ‘साल’ सहित कई बहुमूल्य प्रजातियों के छोटे-बड़े हजारों पेड़ आ रहे हैं।
आरटीआई कार्यकर्ताओं का बड़ा खुलासा: अनुमति की आड़ में महाविनाश
सरकारी आंकड़े भले ही 15,537 पेड़ों की बात कर रहे हों, लेकिन धरातल की सच्चाई कुछ और ही बयां कर रही है। इलाके में सक्रिय आरटीआई (RTI) कार्यकर्ताओं और जानकार सूत्रों का स्पष्ट दावा है कि जिंदल प्रबंधन द्वारा कटाई की आड़ में भारी गोलमाल किया जा रहा है। मशीनों के जरिए अनुमति से कहीं अधिक संख्या में पेड़ों को काटा जा रहा है। अब तक हजारों हरे-भरे पेड़ धराशायी किए जा चुके हैं और यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
ठूंठ में बदल जाएगा तमनार, मंडरा रहा है बड़ा पर्यावरणीय संकट
नागरमुड़ा में हो रही यह अंधाधुंध कटाई सिर्फ कुछ पेड़ों का गिरना नहीं है, बल्कि यह पूरे तमनार ब्लॉक के इकोसिस्टम (पारिस्थितिकी तंत्र) की हत्या है। पर्यावरणविदों और ग्रामीणों का मानना है कि अगर कोयला खदानों के लिए इसी तरह से जंगलों का सफाया होता रहा, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र नक्शे से गायब हो जाएगा। जंगल खत्म होने से न केवल वन्यजीव बेघर होंगे, बल्कि भूमिगत पेयजल स्रोत भी पूरी तरह से सूख जाएंगे।



