रायगढ़। औद्योगिक जिले रायगढ़ में फ्लाई ऐश के निस्तारण का खेल अब एक बड़े फर्जीवाड़े की ओर इशारा कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण मंडल को सौंपी गई NRVS Steels Limited (एनआर इस्पात) की मासिक फ्लाई ऐश यूटिलाइजेशन रिपोर्ट और जमीनी हकीकत के बीच जमीन-आसमान का अंतर है। कंपनी दावों के अनुसार अपनी 100% फ्लाई ऐश ईंट निर्माण (Brick Making Plant) में खपा रही है, लेकिन रायगढ़ के बरपाली नाला, बरदे नाला, केलो नदी के किनारे और जंगलों में पसरी राख प्रशासन और कंपनी के कागजी दावों की पोल खोल रही है।
अगर हर महीने निकलने वाली हजारों टन राख का पूरी तरह से वैज्ञानिक उपयोग हो रहा है, तो खुले क्षेत्रों में डंप की जा रही यह राख आखिर आ कहां से रही है?
आरटीआई से हुए चौंकाने वाले खुलासे
सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मिले दस्तावेजों से पता चलता है कि NRVS Steels Limited ने अपनी रिपोर्ट में फ्लाई ऐश के लैंड फिलिंग, माइन फिलिंग या ऐश डाइक निर्माण जैसे अन्य उपयोगों को शून्य बताया है। पूरी की पूरी राख केवल ईंट बनाने वाले प्लांट्स को दी गई।
कागजों में दर्ज राख उत्पादन के आंकड़े (2024):
- मई: 7,978.28 मीट्रिक टन
- जून: 8,295.94 मीट्रिक टन
- जुलाई: 9,741.29 मीट्रिक टन
- सितंबर: 13,626.16 मीट्रिक टन
- अक्टूबर: 6,142.97 मीट्रिक टन
- नवंबर: 9,510.95 मीट्रिक टन
- दिसंबर: 10,266.55 मीट्रिक टन
लगातार सात महीनों तक कंपनी ने इन हजारों मीट्रिक टन राख का 100% उपयोग दर्शाया है।
ईंट निर्माण क्षमता या केवल कागजी गणित?
दस्तावेजों के मुताबिक यह राख श्री दुर्गा फ्लाई ऐश ब्रिक, मयंक अग्रवाल और एनआर ब्रिक्स प्लांट को सप्लाई की गई है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन ईंट निर्माण इकाइयों के पास हर महीने 6 से 13 हजार मीट्रिक टन फ्लाई ऐश खपाने की वास्तविक उत्पादन क्षमता है?
- क्या इन प्लांट की मशीनरी, बिजली खपत और श्रम क्षमता का कभी स्वतंत्र सत्यापन किया गया?
- क्या इतनी विशाल मात्रा में बनी ईंटों का बाजार में विपणन और परिवहन वास्तव में हुआ है?
विशेषज्ञों का मानना है कि बिना भौतिक निरीक्षण और थर्ड पार्टी ऑडिट के, केवल कागजों पर 100% उपयोग का दावा हजम होने लायक नहीं है।
जलस्रोतों का घोंटा जा रहा दम
एक तरफ फाइलों में सब कुछ हरा-भरा है, वहीं दूसरी तरफ बरपाली नाला और बरदे नाला क्षेत्र के ग्रामीणों का दर्द अलग ही कहानी बयां कर रहा है। स्थानीय लोगों के अनुसार, जलस्रोतों के आसपास भारी मात्रा में फ्लाई ऐश डंप की जा रही है, जो बारिश के पानी के साथ बहकर सीधे रायगढ़ की जीवनदायिनी केलो नदी में मिल रही है।
सवाल यह है कि जब उद्योग अपनी शत-प्रतिशत राख ईंट भट्टों को दे चुके हैं, तो खेतों, जंगलों और नदियों के किनारे यह ‘सफेद जहर’ कौन उगल रहा है?
अब जरूरत है सख्त सार्वजनिक ऑडिट की
रायगढ़ जिले में अप्रैल 2024 से मार्च 2025 के बीच लगभग 1.97 करोड़ मीट्रिक टन फ्लाई ऐश उत्पन्न होने का अनुमान है और सरकारी रिकॉर्ड में लगभग पूरी मात्रा के उपयोग का दावा किया जा रहा है।
अब समय आ गया है कि पर्यावरण विभाग और जिला प्रशासन केवल नोटिस का खेल बंद कर सख्त कदम उठाए:
- सभी फ्लाई ऐश उपयोग रिपोर्टों का तत्काल थर्ड पार्टी ऑडिट हो।
- ईंट निर्माण इकाइयों की वास्तविक क्षमता और बिजली बिलों की जांच की जाए।
- फ्लाई ऐश परिवहन करने वाले वाहनों का जीपीएस सत्यापन हो।
- डंपिंग स्थलों का ड्रोन से सर्वे और नदी-भूजल की वैज्ञानिक जांच कराई जाए।
यह मामला अब सिर्फ एक कंपनी का नहीं, बल्कि रायगढ़ की जनता की सेहत और सार्वजनिक जवाबदेही का बन चुका है। हकीकत और कागजों के इस बड़े अंतर की जिम्मेदारी अब नियामक एजेंसियों को तय करनी ही होगी।



