Skip to content

उजड़ता जोगीडीपा, पनपते रसूखदार: रायगढ़ में विकास की भेंट चढ़े गरीबों के आशियाने, हटरी चौक  के जाम पर खामोश क्यों है ‘सिस्टम’ का बुलडोजर?

रायगढ़।  शहर में इन दिनों ‘विकास’ की एक नई और खौफनाक परिभाषा गढ़ी जा रही है। शहर की सरहदों पर जहां उद्योगों के नाम पर हरे-भरे गांव निगले जा रहे हैं, वहीं शहर के भीतर ‘मास्टरप्लान’ का बुलडोजर चुन-चुन कर गरीबों की बस्तियों को रौंद रहा है। विस्थापन के इस पूरे खेल में एक अलिखित नियम काम कर रहा है— ‘गरीब उजड़ेंगे, ताकि अमीर पनप सकें।’

प्रगति नगर की राख से जोगीडीपा की बर्बादी तक का ‘पैटर्न’

​अगर आप इस खेल की क्रोनोलॉजी (Chronology) को समझें, तो ठीक एक साल पहले का ‘प्रगति नगर कांड’ याद आ जाएगा। तब ‘मरीन ड्राइव’ का सुनहरा ख्वाब दिखाकर एक पूरी बस्ती को बेरहमी से जमींदोज कर दिया गया था। पर्दे के पीछे की असली कहानी जूटमिल के नए मालिकों के हाउसिंग प्रोजेक्ट को एक चौड़ी ‘सड़क’ मुहैया कराना था।

​आज उसी क्रूर इतिहास को इंदिरा नगर की जोगीडीपा बस्ती में दोहराया जा रहा है। इस बार मुखौटा ‘कैनाल लिंक रोड’ का है। आरोप गंभीर हैं और शहर की फिजाओं में तैर रहे हैं— इस तथाकथित सड़क चौड़ीकरण के पीछे रसूखदार कॉलोनाइजरों और ‘साहब’ के करीबी मित्रों की जमीनों का रेट बढ़ाना है। चर्चा तो यहां तक है कि इस बार ‘प्लानिंग’ इतनी अचूक है कि सरकारी मुआवजे की कानूनी बंदरबांट से ‘मित्रों’ की जेबें और भी भारी होने वाली हैं।

सिसकती बस्ती और हार मान चुके लोग

​ऐसा नहीं है कि जोगीडीपा के लोगों ने अपना आशियाना बचाने की जंग नहीं लड़ी। सैकड़ों की तादाद में महिलाएं, बुजुर्ग और बच्चे नगर निगम पहुंचे। मिन्नतें कीं, गुहार लगाई। लेकिन सिस्टम की चौखट पर उनकी चीखें दम तोड़ गईं।

​प्रगति नगर में चली लाठियों और वहां के लोगों के दर्दनाक हश्र को देखकर जोगीडीपा ने हथियार डाल दिए। सियासी नौटंकी के आगे बेबस इन लोगों ने चुपचाप अपने पुरखों की यादों और बचपन की गलियों को छोड़ना मुनासिब समझा। प्रशासन विस्थापन में ‘मदद’ का दिखावा जरूर कर रहा है, और उन्हें शहर से दूर उन वीरान, खस्ताहाल सरकारी मकानों में धकेला जा रहा है, जहां से जिंदगी फिर शून्य से शुरू करनी होगी।

सत्ता का ‘भीष्म’ मौन और विपक्ष का ‘कागजी’ विरोध

​विस्थापन के इस दर्दनाक दौर में रायगढ़ की राजनीति का सबसे स्याह चेहरा सामने आया है:

  • विपक्ष का पानी का बुलबुला: कांग्रेस का विरोध केवल अखबारों की सुर्खियां बटोरने तक सीमित रहा। जांच के नाम पर एक ‘ज्वाइंट कमेटी’ बना दी गई, लेकिन उस कमेटी की रिपोर्ट किस फाइल में दफन है, यह किसी को नहीं मालूम। कहा जा रहा है कि मामला प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भेजा गया है। लेकिन हकीकत वही है— “जंगल में मोर नाचा, किसने देखा!”
  • सत्ताधारी दल की ‘पितामह’ मजबूरी: भाजपा के जो नेता कल तक मुखर थे, आज वे सत्ता के गलियारों में ‘भीष्म पितामह’ बन कर बैठे हैं। वे अपने ही वचनों से ऐसे बंधे हैं कि आँखों के सामने गरीबों का हक छिनता देख रहे हैं, लेकिन रसूखदारों (दुर्योधन) का साथ देने को मजबूर हैं।

रायगढ़ का सुलगता सवाल: विकास का बुलडोजर हटरी चौक तक कब पहुंचेगा?

​जोगीडीपा खाली हो रहा है। कल वहां एक चमचमाती सड़क होगी। लेकिन रायगढ़ के पुराने बाशिंदों के मन में एक सवाल आज भी गूंज रहा है।

​अगर यह सब शहर को ट्रैफिक जाम से मुक्ति दिलाने के लिए हो रहा है, तो रायगढ़ के विधायक और प्रदेश के कथित ‘विकास पुरुष’ ओपी चौधरी (भले ही वे नए हों) से यह सवाल लाजिमी है: हटरी चौक और सुभाष चौक पर हर शाम लगने वाला दमघोंटू और रेंगता हुआ जाम क्या इस कलयुग के अंत तक खत्म हो पाएगा?

​क्या प्रशासन का बुलडोजर कभी शहर के रसूखदार अतिक्रमणकारियों और रईसों के व्यावसायिक इलाकों की तरफ रुख करने की हिम्मत जुटा पाएगा? या फिर ‘विकास’ की इस भेंट चढ़ने के लिए अभी रायगढ़ की और भी कई गरीब बस्तियों का नंबर आना बाकी है?