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मै अनिकेत हूँ.. के मंचन में मेडिकल साइंस से उपजे सवालातों ख्यालातों के अनुत्तरित जवाब की तलाश में दर्शक दीर्घा।

(डॉ. शगुफ्ता परवीन – सुरेंद्र वर्मा, बिलासपुर)

गुजिश्ता हफ्ते स्थानीय सिम्स सभागार में मंचित इस हिंदी नाटक की अकल्पनीय और रहस्यमयी कथानक और जख्मी शख्स की चीख-चित्कार से उपजे सवालातों और खयालातों के अनुत्तरित जवाब की अंतहीन तलाश की भावनेंगिमा रू-ब-रू हुए दर्शकों के जेहन में समाई हुई कौतूहलता नाटक के समापन में देखने सुनने को मिली। परिदृश्य में अदालती कार्यवाही पूरी होने के बाद न्यायाधीश बने पात्र दिलीप लॉबे के समक्ष आखिरी कथन में आरोपी कटघरे में हाजिर मुख्य पात्र और निदेशक शशि वरवंडकर की अपने गुम पहचान को नाम देने की करूणा और पीड़ा से भरी चीखें सभी दर्शक के दिलों को दहला देने में शशि और उनकी टीम पूरी तरह कामयाब रहे हैं।

चलिए जायजा लेते हैं अहम किरदार शशि के बयान का। (जज) आप कुछ कहना चाहेगें..? कहने को तो इतना है जज साहब कि ये सारा उम्र कम पड़ जाए लेकिन जरा मेरी भी तो सोचें मैं मरके जिंदा भी हूँ और जिंदा होकर मरा हुआ है ये कैसी विडंबना है? इसमें कोई संदेह नहीं है डॉ. शिरोडकर ने एक महान और आश्चर्य जनक कार्य किया है। हर देशवासी को इन पर गर्व है, मैं भी उनका हृदय से अभिनंदन करता हूँ, और आभारी हूँ कि जाने-अनजाने में भी इनके इस महत्वपूर्ण कार्य का एक हिस्सा बन सका लेकिन यूअर ऑनर मेरा एक सवाल है मैं कौन हूँ, मैं अपने आप को क्या समझें में शशिकांत जाधव तो नहीं हो सकता मेरा खुद दिल, विवेक कह रहे है कि तुम शशिकांत जाधव नहीं हो?

कौन मरा है. कौन जिंदा है इस बात का फैसला कोन करेगा मैं या ये दुनियों? यूअर ऑनर शरीर का एक अंग बदलना एक बात है और दिमाग बदलना बिलकुल अलग ये शरीर शशिकांत जाधव का है. सिर्फ इसका दिमाग बदला गया है ये कहना उचित नहीं होगा बल्कि उचित होगा कि ये अनिकेत का दिमाग है सिर्फ इसका शरीर बदला गया है क्योंकि अनिकेत ने जो भी देखा समझा और किया ये सब उसके दिमाग ने देखा समझा और किया। सब कुछ तो दिमाग ही करता है, सब कुछ तो दिमाग में ही कैद है. हाथ पैर आँख कान नाक ये तो सब अवयव मात्र है. साधन हैं, सिर्फ इन्हें ही तो बदला गया है अगर इस दिमाग को निकाल कर इसे फिर दूसरे शरीर में डाल दिया जाए तब भी में अनिकेत शर्मा ही होउंगा।

मुझे ना तो जायदाद से मोह है ना पत्नी से मेरी आत्मा मुझसे कह रही है कि तुम अनिकेत हूँ शरीर का कोई अंग बदला जा सकता है, आत्मा तो नहीं बदली जा सकती आज तो यहाँ सारे दर्शन ही उल्टे हो रहे हैं कहते हैं आत्मा वो चीज है जिसे काट कर अलग नहीं किया जा सकता लेकिन यहाँ तो मेरी आत्मा को ही काट कर इस शरीर पर ही चिपका दिया गया है। यूअर ऑनर दिमाग का अर्थ ही होता है आत्मा जब खुद को मैं कहकर संबोधित करता है तो उसको मैं कहता है। ये शरीर तो मिट्टी का खिलौना है, ये तो सब मनुष्य की भावनाएँ हैं जो उसे जानवर से अलग करता है। ये भावनाएँ दया क्षमा प्रेम और शांति हैं। जिस तरह से कपड़े बदले जाते है उसी तरह से मैं अपना ये शरीर बदला है लेकिन मेरी बुद्धि मेरा विवेक मेरी आत्मा चीख चीख कर कह रहे हैं यूअर ऑनर। मैं अनिकेत हूँ मैं अनिकेत हैं और में ही अनिकेत हूँ।

अब इस पटकथा के एक और परत को खोलने से एक नया रहस्य उजागर तब होता है जब ये दृश्य सामने लाया जाता है। मैं ईश्वर को नहीं मानता लेकिन जो कहूँगा सच कहूँगा। और इसीलिए मुंबई से अपना सारा कामकाज छोड़कर यहीं आया हूँ। डॉ. गजानंद ब्रहमानंद शिरोडकर न्यूरो सर्जन (आप सामने खड़े आरोपी को पहचानते हैं? इसे आरोपी कहना ठीक नहीं होगा यूअर ऑनर। ये मेरा पेशेंट है, कुछ दिनों पहले ये मेरे अस्पताल से भाग आया है। वास्तव में देखा जाए तो तब से ही हम लोग इसे खोज रहे थे और जब मेरे ही सहयोगी ने इस मुकदमें के बारे में बताया तो मुझे शक हुआ कि हो ना हो यही मेरा वही भागा हुआ पेशेंट है और मेरा शक सही निकला। मेरे खिलाफ षड़यंत्र की शुरुवात इन्ही से होती है इन्होंने ने मुझे अस्पताल में कैदी बनाकर रखा था हिलने डुलने तक नहीं देते थे जैसे तैसे जान बचाकर भागा हूँ।

आखिर क्यूँ? क्या तकलीफ थी तुम्हें वहां पर ट्रेन हादसे में घायल होने के बाद कितने दिन बेहोश रहा मुझे नहीं मालूम मगर होश आने पर सबसे पहले मैनें इन्हें ही देखा मगर यही डॉक्टर शिरोडकर हैं ये मुझे नहीं मालूम था। तुम जो कह रहे हो वो सब ठीक कह रहे हो लेकिन मैं ये नहीं समझता कि तुम्हें वहां कैदी की तरह रखा गया था। हाँ खाने पीने रहने और इलाज में आपने सारा ध्यान रखा मगर आप और आपके सहयोगी मुझे अजीब नजरों से पूरा करते थे जैसे मैं कोई अजूबा हूँ। डॉ. शिरोडकर में समझता हूँ कि इस बारे में आप ही प्रकाश डाल सकते है… यस यूअर ऑनर। ये जो कह रहे वो ठीक कह रहे हैं लेकिन आज और अभी ये जो हमारे सामने खड़े हैं वास्तव में से अजूबा ही है ये व्यक्ति कौन हैं मैं इन्हें नहीं जानता नहीं पहचानता लेकिन इस मुकदमें के सिलसिले में दो नामों का जिक आया है एक अनिकेत शर्मा और दूसरा शशिकांत जाधव। जरा विस्तार से अदालत को बताएंगे यस यूअर ऑनर।

जिंदगी की राह में कभी कभी ऐसे मोड़ भी आते हैं. जब मेरे जैसे शांत लोग भी हिल जाते है। जिस हादसे में ये पेशेंट घायल हुआ था जख्मी और मृत लोगों की संख्या इतनी ज्यादा थी कि आसपास के अस्पतालों में जगह नहीं बची थी ऐसे में कुछ जख्मियों को हवाई जहाज से मेरे अस्पताल में लाया गया। उनमें से दो व्यक्तियों की हालत अत्यंत ही नाजुक थी। एक के शरीर में बहुत सारे जख्म थे, उन जख्मों के कारण उसके शरीर के बहुत से महत्वपूर्ण अंग नष्ट हो चुके थे, जैसे किडनी, लीवर वहीं दूसरे के शरीर पर मामूली चोटें थी।

परंतु सिर में गंभीर चोट के कारण उसका दिमाग यानि ब्रेन पूरी तरह से नष्ट हो चुके थे. समय बहुत कम था। बस प्राण बचाने के लिए आपरेशन करना जरूरी था, लेकिन हमे इन दोनों के करीबी रिश्तेदार नहीं मिले। लिहाजा हमें इन दोनों के रिश्तेदारों की गैर मौजूदगी में ही आपरेशन करने का निर्णय लेना पड़ा। क्योंकि प्रश्न जीवन बचाने का था और हम निर्णय लेने में देर नहीं कर सकते थे। यूअर ऑनर मैं एक न्यूरोसर्जन हूँ, दिमागी रोगों के इलाजों पर अनुसंधान करता रहा हूँ और ऐसे में ये अवसर जब मुझे मिला तो मैं इसे अपने हाथ से गंवाना नहीं चाहता था। मैने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर इस आपरेशन करने का निर्णय लिया यूअर ऑनर। मुझे बताते हुए ये फख है कि मेरे और मेरे सहयोगियों के द्वारा किया गया यह आपरेशन शत प्रतिशत सफल रहा और ये काम दुनिया में किया गया सबसे पहला ब्रेन ट्रांसप्लांट।

चिकित्सा विज्ञान के इतिहास में देश द्वारा खोला गया एक नया अध्याय। एक स्वस्थ दिमाग को एक लाइलाज शरीर से निकाल कर मैने ऐसे एक ऐसे लाइलाज शरीर में डाल दिया यानि कि ब्रेन पूरी तरह से नष्ट हो चुका था आपरेशन के बाद हम सभी पशोपेश में थे पेशेंट की जिंदगी और मौत का सवाल था दिन रात हम इस पर कड़ी नजर रखे हुए थे हमने और फिर चंद दिनों के बाद उसके शरीर में हलचल होने लगी उसके खोपड़ी में डाले गये दिमाग ने अपना काम करना शुरू कर दिया था शरीर के विभिन्न अंग उसके दिमाग के आदेश का पालन करने लगे जैसे एक नार्मल व्यक्ति के शरीर में होता है इस तरह उस मृत मानव की चेतना जागृत हो गई जो महिनों से सोई हुई थी। और इन्द्रियो ने अपना काम करना शुरू कर दिया शरीर पर दिमाग का नियंत्रण स्थापित हो गया था।

इस अ‌द्भुत घटना के हम सब साक्षी है, और हमें ये जानने की उत्सकुता थी, मरीज की हालत आगे कैसी होती है, वो इलाज को किस तरह से रिस्पांस करता है? इतना जरूर था हमने अपने प्रयासों से एक महत्वपूर्ण सफलता हासिल कर ली थी तो क्या आप ये कहना चाहते हैं कि अनिकेत का दिमाग निकाल कर शशिकांत के खोपडी में डाला और पुलिस ने अनिकेत की लाश को लावारिस समझ कर जला दिया मैं यही कहना चाहता हूँ लेकिन हमारी मजबूरी यही थी कि हमे इन दोनों के नाम पते मालूम नहीं थे। यूअर ऑनर कानून की निगाह से मेरा यह काम शायद अपराध की श्रेणी में आए शायद मुझ पर ये इलजाम लगे कि मैंने एक आदमी का खून किया है लेकिन मेरा पेशा जान बचाने का है और वही मैने किया, मुझे अपने किये पर कोई पछतावा नहीं है।

बल्कि मैं तो स्वयं को गर्वान्वित महसूस करता हूँ जहाँ दो जीवन नष्ट होने जा रहे थे वहाँ मैंने एक को तो बथा लिगा यदि में ऐसा ना करता ता ना ही शशिकांत की जान बचता और ना ही अनिकेतन शर्मा। मौत के पंजों से मैं एक को छीनने में कामयाब रहा यूअन ऑनर यदि आज मुझे किये पर सजा भी होती है तो मुझे कोई दुख नहीं होगा। और आखिर में सरकारी वकील की जिरह का जैश यूजर ऑनर डॉ. शिरोडकर ने बेशक इस दुनिया में बेमिसाल इलाजी चमत्कार किया है मेरी राय में यह मुकदमा भी अलग इस किस्म का अलग ही मुकदमा होगा अब सवाल ये उठता है कि ये आदमी इस दुनिया में किस नाम से पहचाना जाएगा। ये एक पेचीदा स्थिति हो सकती है। लेकिन मेरी राय में इसका उत्तर काफी सरल है, अब तक शरीर की चमडी, लीवर, हॉर्ट, बाल यहाँ तक कि नैन भी ट्रॉसप्लांट किये जा चुके हैं। इस केस में तो दिमाग को ट्रॉसप्लॉट किया गया है. अब ये दिमाग किस व्यक्ति से लिया गया है यह महत्वपूर्ण नहीं है, महत्वपूर्ण है ये लगाया गया है। अगर हम पृथ्वी पर हुए पहले हार्ट ट्रॉसप्लॉट का केस लें तो ये पायेंगे कि जिस व्यक्ति को ये हार्ट लगाया गया था उसका नाम था ब्लैक बर्ग और जिससे लिया गया था उसका कुछ और ही नाम था लेकिन ब्लैक बर्ग को ब्लैक बर्ग के नाम से ही जाना जाता रहा है।

इस केस में भी अनिकेत शर्मा की मृत्यु हो गई है और शशिकांत जाधव जिंदा है यही राथ है। कानून के हिसाब से यदि किसी व्यक्ति की पहचान उसके जन्म, रंग, लंबाई और फिंगर प्रिंट से की जाती है। इन सब बातों को आधार माने तो सामने खड़ा यह व्यक्ति और कोई नहीं शशिकांत जाधव ही है ही सिर्फ इसका दिमाग बदला गया है, जो कि अनिकेत का है। इसलिए यूअर ऑनर अनिकेत की स्मृतियों और भावनाएँ भी शशिकांत की भावनाएँ नहीं होगी। इस बारे में एक तर्क ये भी दिया जा सकता है कि यदि किसी व्यक्ति को उसके पूर्व जन्म का स्मरण हो रहा हो तब भी वह व्यक्ति पूर्व जन्म की पत्नी, अथवा संपत्ति पर अपना अधिकार नहीं जत्ता शगुफ्ता परवीन सकता। और फिर शास्त्रों में भी मात्र शरीर को ही संज्ञा दी गई है।

विवाह में भी तो शरीरों के साथ दो हृदयों का भी मिलन होता है। इन सब बातो को आधार माने तो सामने खड़ा ये व्यक्ति और कोई नहीं शशिकोंत जाधव ही है। हीं. इसने अब तक जो बर्ताव किया अनजाने में किया है. इसलिए यूअर ऑनर इस पर लगे सारे इल्जाम निरस्त किए जाएँ और इसे बाईज्जत बरी किया जाए। महाराष्ट्र मंडल, रायपुर की खास पेशकश में किरदार श्री चेतन दंडवते, विनोद राखुडे, पंकज सराफ, रविंद्र ठेंगड़ी, समीर टूल्लू, एस.एस. खंगन, डॉ. अभया जोगलेकर, डॉ. अनुराधा दुबे, डॉ. प्रीता लाल, आचार्य रंजन मोडक की भागीदार रही।