रायगढ़/तमनार। कागजों पर यह भारत सरकार की महारत्न कंपनी एसईसीएल (SECL) के पेलमा खदान प्रोजेक्ट के लिए आयोजित एक ‘पर्यावरण जनसुनवाई’ थी। लेकिन तमनार के पंडाल का नजारा कुछ और ही बयां कर रहा था। आरोप है कि एसईसीएल यहां महज एक ‘मुखौटा’ नजर आई, जबकि पूरी व्यवस्था का रिमोट कंट्रोल निजी कॉर्पोरेट (अडानी प्रबंधन) के हाथों में था। जनसुनवाई के नाम पर प्रशासन और कॉर्पोरेट के गठजोड़ ने कथित तौर पर एक ऐसा ‘स्क्रिप्टेड शो’ पेश किया, जिसमें असली प्रभावित किसानों की चीखें बाउंसरों की मुस्तैदी और प्रायोजित भाषणों के शोर में गुम हो गईं।
खाकी बनी ‘इवेंट मैनेजर’, कोरबा के बाउंसरों ने संभाला मोर्चा
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, जनसुनवाई से पहले ही तमनार पुलिस ने शांति व्यवस्था का हवाला देते हुए सरपंचों और ग्रामीणों को स्पष्ट हिदायत दी थी कि कोई बाहरी व्यक्ति प्रवेश नहीं करेगा। लेकिन मौके पर स्थिति हास्यास्पद और डरावनी दोनों थी। किसानों के पैरोकारों को तो ‘बाहरी’ बताकर रोक दिया गया, लेकिन भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर कोरबा से बुलाए गए ‘पुरुष और महिला बाउंसरों’ के लिए सारे नियम ताक पर रख दिए गए।
पंडाल में दहशत का आलम यह था कि मोबाइल से वीडियो बनाने या तस्वीर खींचने वालों के पीछे महिला बाउंसरों को साये की तरह खड़ा कर दिया गया था। कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी संभालने वाली पुलिस वहां महज ‘इवेंट मैनेजर’ और मूकदर्शक की भूमिका में नजर आई, जबकि असली पहरेदारी कोरबा से आए ये बाउंसर कर रहे थे।
4 घंटे तक गूंजते रहे ‘प्रायोजित’ सुर, प्रभावितों को नहीं मिला मौका
जनसुनवाई की निष्पक्षता पर सबसे बड़ा सवाल इसके समय प्रबंधन को लेकर उठ रहा है। 6 घंटे तक चली इस पूरी प्रक्रिया में करीब 3 से 4 घंटे का समय महज 6-8 वक्ताओं ने ले लिया। आरोप है कि ये वक्ता कॉर्पोरेट प्रबंधन के ही ‘प्रायोजित’ चेहरे थे, जिन्होंने एक-एक घंटे तक माइक नहीं छोड़ा। रणनीति स्पष्ट थी—समय व्यतीत करना, ताकि खदान से सीधे तौर पर उजड़ने वाले असली ग्रामीणों को अपनी आपत्ति दर्ज कराने का मौका ही न मिल सके।
पंडाल में समर्थन दिखाने के लिए जुटाई गई भीड़ में भी कई चेहरे कथित तौर पर दूसरे प्लांट से लाए गए ठेका मजदूर और कर्मचारी थे। यानी ‘भीड़’ भी किराए की और ‘भाषण’ भी प्रायोजित!

‘रील लाइफ’ के लिए रेड कार्पेट, ‘रियल लाइफ’ के लिए बैरिकेड्स
इस पूरे घटनाक्रम ने रायगढ़ प्रशासन के दोहरे रवैये की भी पोल खोल दी है। साल 2022 का अक्टूबर महीना याद करें, जब बॉलीवुड अभिनेता अक्षय कुमार ‘मिशन रानीगंज’ की शूटिंग के लिए चार्टर्ड प्लेन से रायगढ़ पहुंचे थे। तब एक ‘बाहरी’ अभिनेता के लिए प्रशासन ने खदानों के दरवाजे खोल दिए थे और रेड कार्पेट बिछाया गया था।
लेकिन आज, जब तमनार के मूल निवासी अपनी ‘रियल लाइफ’ की त्रासदी और उजड़ते अस्तित्व को बचाने की गुहार लगा रहे हैं, तो उन्हें ‘बाहरी’ और ‘अवांछित’ बताकर बाउंसरों के धक्के खाने के लिए छोड़ दिया गया है। विडंबना यह है कि फिल्मों में पर्यावरण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले उन सितारों को भी तमनार के उजड़ते पर्यावरण की कभी याद नहीं आई।
विपक्ष की खामोशी और रस्म अदायगी
पर्यावरण और आदिवासियों के अधिकारों पर सियासत करने वाले स्थानीय राजनीतिक दल और रायगढ़ कांग्रेस भी इस पूरे मामले में रस्म अदायगी करते ही नजर आए।

कुल मिलाकर, तमनार की यह जनसुनवाई महज एक ‘खानापूर्ति’ साबित हुई। जिस प्रोजेक्ट के मंच पर सार्वजनिक उपक्रम से ज्यादा निजी कंपनियों का दखल और उनके बाउंसरों की दहशत हावी हो, वहां पर्यावरण संरक्षण और आदिवासियों के अधिकारों की बात करना एक बेमानी सा ख्वाब लगता है।



