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तमनार में फिर सुलग रही है विरोध की आग: 19 मई को SECL की पेलमा खदान हेतु ‘महा-जनसुनवाई’, अडाणी ग्रुप की एंट्री से ग्रामीण आक्रोशित..!

रायगढ़ 05 मई 2026। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले का तमनार ब्लॉक एक बार फिर औद्योगिक विकास और अस्तित्व की लड़ाई का अखाड़ा बनने जा रहा है। आगामी 19 मई को साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) की प्रस्तावित ‘पेलमा ओपन कास्ट कोल माइन’ परियोजना को लेकर पर्यावरण जनसुनवाई आयोजित की गई है। लेकिन इस तारीख से पहले ही क्षेत्र में तनाव और भारी आक्रोश व्याप्त है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि सरकारी कंपनी की आड़ में यह प्रोजेक्ट निजी हाथों में सौंपा गया है।

विशालकाय प्रोजेक्ट और ‘विनाश’ का डर

दस्तावेजों के मुताबिक, पेलमा ओपन कास्ट माइन की क्षमता 15 मिलियन टन प्रति वर्ष (15 MTPA) है। यह परियोजना लगभग 2077 हेक्टेयर में फैली होगी। सबसे डरावना पहलू इसका पर्यावरणीय प्रभाव है—रिपोर्ट्स के अनुसार, इस खदान के लिए 362 हेक्टेयर का घना जंगल साफ कर दिया जाएगा।

​रायगढ़ के स्थानीय निवासियों का कहना है कि शहर पहले से ही कोयले की धूल और फ्लाई ऐश की मार झेल रहा है। 30 किलोमीटर दूर तक घरों की छतों पर जमने वाली कालिख इस बात का सबूत है कि पारिस्थितिकी तंत्र पहले ही चरमरा चुका है।

सरकारी मुखौटा, अडाणी का हाथ?

​ग्रामीणों के कड़े विरोध की मुख्य वजह इस प्रोजेक्ट का ‘अडाणी कनेक्शन’ है। हालाँकि कागजों पर यह SECL की खदान है, लेकिन अगस्त 2023 के आधिकारिक समझौते के अनुसार, इसे MDO (माइन डेवलपर एंड ऑपरेटर) मॉडल के तहत अडाणी एंटरप्राइजेज की कंपनी ‘पेलमा कोलियरीज’ को सौंपा गया है।

  • 20 साल का एग्रीमेंट: डिजाइन से लेकर उत्खनन और मेंटेनेंस तक की पूरी जिम्मेदारी अडाणी ग्रुप की होगी।
  • आरोप: स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि SECL केवल एक नाम है, असल मुनाफा निजी कंपनी कमाएगी जबकि तमनार की जनता प्रदूषण और विस्थापन झेलेगी।

विस्थापन की जद में 9 गाँव और PESA कानून का उल्लंघन

​इस परियोजना से मुख्य रूप से 9 गाँव सीधे तौर पर प्रभावित होंगे:

पेलमा, उरबा, मदुवाडुमर, लालपुर, हिंझर, जरहीडीह, साकता, मिलुपारा और खर्रा।

​इन गाँवों के आदिवासियों और किसानों में अपनी आजीविका और पुश्तैनी जमीन खोने का डर है। ग्रामीणों का आरोप है कि यह क्षेत्र पेसा (PESA) कानून के तहत आता है, जहाँ ग्रामसभा की सहमति अनिवार्य है, लेकिन प्रशासन इन संवैधानिक अधिकारों को दरकिनार कर जबरन भूमि अधिग्रहण की राह पर है।

रायगढ़ के भविष्य पर सवाल

​तमनार का इतिहास आंदोलनों का रहा है। पूर्व में जिंदल और अडाणी के अन्य प्रोजेक्ट्स के दौरान भी हिंसक झड़पें और विरोध देखा गया है। 19 मई को होने वाली जनसुनवाई प्रशासन के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होगी।

​यह लड़ाई केवल जमीन बचाने की नहीं, बल्कि सांसें बचाने की भी है। रायगढ़ के प्रबुद्ध नागरिकों का मानना है कि यदि आज इस अंधाधुंध खनन को नहीं रोका गया, तो आने वाली पीढ़ियां केवल बीमारियों और सूखे भूजल की विरासत पाएंगी।