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पानी में जहर, प्रशासन बेअसर: नवदुर्गा प्लांट और ट्रांसपोर्टर के मुनाफे की भेंट चढ़ी ‘केलो नदी’, राख वाला पानी पीने को मजबूर रायगढ़ की जनता!

रायगढ़। जरा सोचिए, जिस पानी को आप अपने परिवार को पिलाते हैं, जिससे आपके घर का खाना पकता है, अगर उसमें खामोशी से औद्योगिक राख (फ्लाई ऐश) का जहर मिला दिया जाए, तो यह कैसा लगेगा? नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) नदियों को बचाने के लिए चिता की राख बहाने पर भी एतराज जाताना है, लेकिन रायगढ़ के औद्योगिक क्षेत्रों में इसी NGT के नियमों की चिता हर दिन सरेआम जलाई जा रही है।

​यह सिर्फ पर्यावरण का मुद्दा नहीं है, यह सीधे तौर पर हमारी और आपकी सेहत, हमारी आने वाली नस्लों और जीवन से जुड़ा अपराध है। ‘रायगढ़ सृष्टि’ की इस विशेष ग्राउंड रिपोर्ट में हम आपको दिखाएंगे कि कैसे मुनाफे की अंधी दौड़ में नवदुर्गा प्लांट और राख का परिवहन करने वाले ट्रांसपोर्टर रायगढ़ की जीवनदायिनी को काले जहर में तब्दील कर रहे हैं।

​कुदरत के साथ खिलवाड़: ‘बरदे नाले’ का चीखता सच

​बरपाली ग्राम का प्राकृतिक ‘बरदे नाला’ कभी अपनी स्वच्छ जलधारा के लिए जाना जाता था, लेकिन आज इसकी तस्वीर रुला देने वाली है। इसके दोनों किनारों को फ्लाई ऐश (औद्योगिक राख) से बेरहमी से पाट दिया गया है।

​नाले के पानी की प्राकृतिक धार के साथ यह राख अब ‘धीमे जहर’ की तरह घुलकर सीधे रायगढ़ की जीवनदायिनी ‘केलो नदी’ की ओर बह रही है। दूर से देखने पर यह किसी संगम जैसा प्रतीत होता है, लेकिन यह आस्था और पवित्रता का नहीं, बल्कि औद्योगिक स्वार्थ और हमारी बर्बादी का काला संगम है।

​राख माफिया का गठजोड़: निशाने पर नवदुर्गा प्लांट और ट्रांसपोर्टर

​जलस्रोतों को इस तरह सरेआम तबाह करने का दुस्साहस यह साबित करता है कि उद्योगपतियों और ट्रांसपोर्टर्स को न तो कानून का खौफ है और न ही इंसानी जिंदगियों की परवाह।

  • आरोप के घेरे में प्लांट: स्थानीय ग्रामीणों का सीधा और गंभीर आरोप है कि नाले में डंप किया गया यह मौत का सामान ‘नवदुर्गा’ प्लांट का है।
  • ट्रांसपोर्टर की मनमानी: जानकारी के अनुसार, इस राख को जलस्रोतों में बेखौफ पाटने का ठेका ट्रांसपोर्टर रोहतास नेहरा की फर्म के पास है, जिसने मुनाफे के लिए करीब 2 महीने पहले ही यहां राख के पहाड़ खड़े कर दिए।

​कुदरत की बारिश ने धोया प्रशासनिक लीपापोती का पर्दा

करीब 8 महीने पहले जब इस नाले में राख डंपिंग की शिकायत हुई थी, तब वन और पर्यावरण विभाग के अधिकारियों ने जो किया, वह किसी भी संवेदनशील इंसान को विचलित कर देगा।

​अधिकारियों ने समस्या का ठोस समाधान निकालने के बजाय राख के उन ढेरों पर सिर्फ मिट्टी का छिड़काव करवा कर मामले को दफना दिया। रायगढ़ इस्पात प्लांट पर नाममात्र का जुर्माना लगाकर फाइलें बंद कर दी गईं। लेकिन कुदरत को फरेब नहीं दिया जा सकता। इस बार की तेज बारिश ने उस मिट्टी के आवरण को धो डाला और अधिकारियों के ‘किए-धरे’ को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। आज वह राख फिर से पानी की धार के साथ बहकर हमारी जिंदगियों में जहर घोल रही है।