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सुलगते सवाल: 18 मई से 2 जून तक ज्ञापनों की अनदेखी… SECL-Adani पेलमा खदान जनसुनवाई क्या सिर्फ ‘विश्वास और विकास’ का सरकारी नाटक है?

रायगढ़ | क्या आदिवासियों और ग्रामीणों के अधिकारों की बात करने वाला तंत्र सिर्फ कागजों पर ही हमदर्द है? क्या औद्योगिक घरानों के सामने जनता की चीखें नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती हैं? ये वो सुलगते सवाल हैं जो रायगढ़ के पेलमा कोल ब्लॉक की आगामी जनसुनवाई से पहले पूरे क्षेत्र में गूंज रहे हैं।

​18 मई से लेकर 2 जून तक प्रभावित ग्रामीणों ने प्रशासन की चौखट पर दर्जनों ज्ञापन सौंपे, अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात रहा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या यह पूरी जनसुनवाई महज ‘विश्वास और विकास’ के मुखौटे के पीछे खेला जा रहा एक सरकारी नाटक है?

15 दिनों तक गुहार, पर प्रशासन के कान पर जूं तक नहीं रेंगी!

​सूत्रों के मुताबिक, पेलमा खदान से प्रभावित होने वाले गांवों के जागरूक नागरिकों, पर्यावरण प्रेमियों और आदिवासी समाज ने 18 मई से 2 जून के बीच सिलसिलेवार ढंग से अपनी शिकायतें प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल के सामने रखी थीं। इन ज्ञापनों में साफ तौर पर जमीन अधिग्रहण, रोजगार के झूठे वादे, वायु-जल प्रदूषण और पेसा (PESA) कानून के उल्लंघन का कच्चा चिट्ठा खोला गया था।

​हैरानी की बात यह है कि इन 15 दिनों में प्रशासन ने इन आपत्तियों का निराकरण करने के बजाय इन्हें ठंडे बस्ते में डाल दिया। जनता पूछ रही है कि जब शिकायतों पर सुनवाई ही नहीं करनी थी, तो इन ज्ञापनों का पुलिंदा क्यों तैयार करवाया गया?

कॉर्पोरेट की ‘रफ्तार’ के आगे जनता की ‘चीख’ अनसुनी?

​SECL और अदाणी समूह की इस संयुक्त पेलमा खदान को लेकर क्षेत्र में भारी आक्रोश है। सरकार एक तरफ ‘सबका साथ, सबका विकास’ और ‘जनता का विश्वास’ जीतने का ढिंढोरा पीटती है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह है कि पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए स्थानीय आदिवासियों के अस्तित्व को दांव पर लगा दिया गया है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि जनसुनवाई के नाम पर सिर्फ एक ‘औपचारिक ड्रामा’ रचा जा रहा है, ताकि खदान शुरू करने के लिए कागजी कोरम पूरा किया जा सके।

“जब जनता की आपत्तियों पर कोई बात ही नहीं करना चाहता, जब हमारा भविष्य पहले से ही बंद कमरों में तय हो चुका है, तो फिर इस जनसुनवाई का ढोंग क्यों?”

— प्रभावित ग्रामीणों का तीखा सवाल

इतिहास गवाह है: गारे-पेलमा में हमेशा दबाया गया विरोध!

यह कोई पहला मौका नहीं है जब रायगढ़ का यह कोयलांचल सुलग रहा हो। इससे पहले भी गारे-पेलमा क्षेत्र की कई जनसुनवाइयों में भारी धांधली, फर्जी ग्राम सभाओं के प्रस्ताव और पुलिसिया बल के दम पर ग्रामीणों की आवाज को कुचलने की कोशिशें हुई हैं। पूर्व में जनता के उग्र विरोध के कारण कई जनसुनवाइयां स्थगित भी करनी पड़ी थीं। लेकिन प्रशासन ने अतीत की गलतियों से सबक लेने के बजाय, एक बार फिर जनभावनाओं को दरकिनार करने का रास्ता चुन लिया है।

इन 3 मोर्चों पर ठगा महसूस कर रहा है रायगढ़ का ग्रामीण:

  • जल, जंगल और जमीन की तबाही: भारी-भरकम मशीनों और ब्लास्टिंग से पूरा इलाका धूल के गुबार में तब्दील हो जाएगा, भूजल स्तर पाताल में चला जाएगा।
  • रोजगार के नाम पर सिर्फ ‘सफाईकर्मी’ और ‘चौकीदार’ की नौकरी: बड़ी कंपनियां वादे तो ऊंचे पदों के करती हैं, लेकिन स्थानीय युवाओं को सिर्फ ठेकेदारी प्रथा में धकेल दिया जाता है।
  • संवैधानिक अधिकारों का हनन: पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून के तहत ग्राम सभा की वास्तविक सहमति को पूरी तरह से बायपास किया जा रहा है।

खबर का नजरिया: औपचारिकता या इंसाफ?

​अब गेंद जिला प्रशासन और सरकार के पाले में है। क्या 18 मई से 2 जून तक मिले ज्ञापनों पर गंभीरता से विचार कर इस जनसुनवाई को पारदर्शी बनाया जाएगा? या फिर हमेशा की तरह, भारी पुलिस बल के साये में, विरोध करने वालों को ‘विकास विरोधी’ बताकर इस सरकारी नाटक का पटाक्षेप कर दिया जाएगा? रायगढ़ की जनता की नजरें प्रशासन के अगले कदम पर टिकी हैं।