रायगढ़। विकास की अंधी दौड़ में प्रकृति की बलि चढ़ना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब हसदेव अरण्य के बाद रायगढ़ जिले के समृद्ध और सघन जंगल भी कॉर्पोरेट घरानों के निशाने पर आ गए हैं। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिकार प्राप्त समिति ने रायगढ़ की दो बड़ी कोयला खदान परियोजनाओं- पुरुंगा और पेलमा- के लिए कुल 983.44 हेक्टेयर वन भूमि के डायवर्जन को सैद्धांतिक (स्टेज-1) मंजूरी दे दी है। इस फैसले के साथ ही जिले की आबोहवा को शुद्ध रखने वाले 56,000 से अधिक हरे-भरे पेड़ों के कटने का रास्ता साफ हो गया है।
इस पूरी कवायद में सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह सामने आया है कि इन दोनों ही परियोजनाओं का सीधा या परोक्ष नियंत्रण ‘अडानी ग्रुप’ (Adani Group) के हाथों में है।
पुरुंगा कोल ब्लॉक: अंबुजा सीमेंट्स के रास्ते अडानी का दखल
केंद्र सरकार की वन सलाहकार समिति ने हाल ही में जिले की छाल तहसील स्थित ‘पुरुंगा अंडरग्राउंड कोल ब्लॉक’ को हरी झंडी दी है। इसके तहत 621.331 हेक्टेयर वन भूमि का डायवर्जन किया जाएगा। गौरतलब है कि यह ब्लॉक अंबुजा सीमेंट्स लिमिटेड (Ambuja Cements Limited) को आवंटित किया गया है, जो अब पूरी तरह से गौतम अडानी के नेतृत्व वाले अडानी ग्रुप के स्वामित्व में है।
अडानी के मालिकाना हक वाली इस कंपनी के लिए जंगल के 4,368 पेड़ों पर कुल्हाड़ी चलेगी। राज्य सरकार की रिपोर्ट भी इस बात की पुष्टि करती है कि प्रस्तावित खनन क्षेत्र और उसके आसपास एशियाई हाथी, स्लॉथ भालू, भारतीय पैंगोलिन और चीता जैसे दुर्लभ वन्यजीवों का प्राकृतिक रहवास और निरंतर आवाजाही है।
पेलमा कोल ब्लॉक: खदान SECL की, लेकिन ठेका अडानी के पास
रायगढ़ की हरियाली पर दूसरा और सबसे बड़ा प्रहार ‘पेलमा ओपन कास्ट कोयला खदान’ के रूप में होने जा रहा है। 2,077.935 हेक्टेयर के कुल खनन पट्टे वाले इस प्रोजेक्ट में 362.109 हेक्टेयर सघन वन भूमि सीधे तौर पर प्रभावित होगी। ओपन कास्ट माइनिंग के नाम पर यहां 52,570 पेड़ों की अंधाधुंध कटाई का प्रस्ताव पारित किया गया है।
दस्तावेजों में यह खदान साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL) के नाम दर्ज है, लेकिन पर्दे के पीछे का ‘खेल’ एमडीओ (MDO) मॉडल में छिपा है। SECL ने यहां से कोयला निकालने के लिए MDO (Mine Developer and Operator) के तहत जो भारी-भरकम अनुबंध किया है, वह अडानी ग्रुप को ही मिला है। अर्थात्, खदान भले ही सरकारी कंपनी की हो, लेकिन 52 हजार पेड़ काटकर कोयला निकालने का काम अडानी की कंपनी के ही जिम्मे है।
छिन जाएगा हाथियों का घर, मंडरा रहा है महासंकट
वन विभाग की खुद की रिपोर्ट यह स्वीकार करती है कि पेलमा और पुरुंगा के इन जंगलों में हाथियों का निरंतर मूवमेंट रहता है। भले ही इसे तकनीकी रूप से ‘आधिकारिक’ एलीफेंट कॉरिडोर घोषित न किया गया हो, लेकिन रायगढ़ में जिस पैमाने पर 56 हजार से ज्यादा पेड़ों की कटाई होने वाली है, उससे हाथियों का आशियाना उजड़ना तय है। इसके सीधे परिणाम स्वरूप रायगढ़ जिले में मानव-हाथी द्वंद्व (Human-Elephant Conflict) का खतरा एक बेहद खतरनाक स्तर तक पहुंच जाएगा।
क्या रायगढ़ में भी दोहराई जाएगी हसदेव की कहानी?
रायगढ़ के इन जंगलों पर मंडराते संकट से पहले, बीते जून महीने में ही केंद्र सरकार ने हसदेव अरण्य के जंगलों में स्थित केते एक्सटेंशन इंटीग्रेटेड कोयला ब्लॉक में खनन के लिए पर्यावरणीय मंजूरी दी थी। वहां करीब 4.48 लाख पेड़ों की कटाई का प्रस्ताव है और वह ब्लॉक भी अडानी ग्रुप से जुड़ा है।
हसदेव के बाद अब रायगढ़ में भी कोयले पर एकाधिकार (Monopoly) स्थापित करने के लिए प्राकृतिक संसाधनों को जिस तरह से एक ही कॉर्पोरेट घराने के इर्द-गिर्द सिमटा जा रहा है, वह न केवल वन-आश्रित समुदायों के लिए गहरी चिंता का विषय है, बल्कि रायगढ़ के पर्यावरण के लिए एक बेहद डरावनी नज़ीर पेश कर रहा है।



