रायगढ़। ऊर्जा धानी के नाम से मशहूर रायगढ़ जिला अब बड़े औद्योगिक घरानों, विशेषकर अडानी समूह की महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की जकड़ में आता दिख रहा है। जिले के अलग-अलग हिस्सों में चल रहे प्रोजेक्ट्स और उनके भारी विरोध को देखकर अब स्थानीय लोगों की जुबान पर एक ही बात है— ऐसा लग रहा है मानो अडानी पूरे रायगढ़ को निगल रहा है। एक तरफ नई खदानों के लिए जमीनें छीनी जा रही हैं, तो दूसरी तरफ कोयला परिवहन के लिए रेलवे लाइनों का जाल बिछाकर शहर की सांसें घोंटी जा रही हैं।
पेलमा खदान: विस्थापन का डर और औपचारिकता बनी जनसुनवाई
तमनार ब्लॉक के पेलमा में एसईसीएल और अडानी के संयुक्त उपक्रम वाले 15 एमटीपीए क्षमता के ओपनकास्ट कोल माइन प्रोजेक्ट को लेकर ग्रामीणों में भारी आक्रोश है।जून को हुई जनसुनवाई के दौरान ग्रामीणों ने अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया था। स्थानीय लोगों को अपनी जमीन, जंगल और आजीविका छिनने का डर सता रहा है। ग्रामीण साफ कह रहे हैं कि उन्हें विकास के नाम पर विस्थापन मंजूर नहीं है, लेकिन उनकी आवाजें फाइलों में दबती नजर आ रही हैं। वहीं, कोरबा वेस्ट पावर प्लांट का विस्तार भी पर्यावरण मंजूरी मिलने के बाद अपनी राह पकड़ चुका है।
कोतरा रोड और गेजामुड़ा: बिना मुआवजे और सहमति के मनमानी
केवल खदानें ही नहीं, इन खदानों से कोयला ढोने के लिए बन रही रेलवे लाइनें भी शहर के लिए नासूर बन गई हैं। कोतरा रोड स्थित रेलवे की चौथी लाइन और कॉरीडोर का काम इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां किसानों की जमीनें अधिग्रहित कर ली गईं, लेकिन मुआवजे के नाम पर उन्हें या तो कौड़ियों के भाव पैसे थमाए जा रहे हैं या फिर अब तक फूटी कौड़ी नहीं मिली है। गेजामुड़ा में भी रेलवे लाइन के लिए बिना किसानों की सहमति के जबरन काम शुरू करने की कोशिश की जा रही है, जिसके चलते लोग मशीनों के सामने आकर काम रुकवाने को मजबूर हैं।
धूल, जाम और बदहाल व्यवस्था से पिसती जनता
ठेकेदारों की मनमानी का आलम यह है कि बिना उचित सर्विस रोड बनाए कोतरा रोड का काम चालू कर दिया गया है। इससे शहर का ट्रैफिक सिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है। जरा सी बारिश में अंडरब्रिज में पानी भर जाता है, व्यापारियों का धंधा चौपट हो रहा है और आम आदमी रोज जाम की चक्की में पिस रहा है। इसके साथ ही, रिहायशी इलाकों के बीच से गुजरने वाली इन कोयला लाइनों से उड़ने वाली धूल ने लोगों का जीना मुहाल कर दिया है।
क्या कॉरपोरेट के दबाव में है प्रशासन?
इन सभी मामलों में सबसे निराशाजनक भूमिका स्थानीय प्रशासन और रेलवे अधिकारियों की रही है। आम जनता और किसानों की जायज आपत्तियों का समाधान निकालने के बजाय, अधिकारी अक्सर बिना सहमति बनाए काम आगे बढ़ाने का प्रयास करते हैं। ऐसा लगता है मानो पूरा महकमा कॉरपोरेट हितों को साधने में लगा हुआ है।
आखिर यह कैसा विकास है जो स्थानीय लोगों को ही उजाड़ कर किया जा रहा है? अगर हालात यही रहे और प्रशासन ने जनता की नहीं सुनी, तो वह दिन दूर नहीं जब रायगढ़ का अपना वजूद ही इन औद्योगिक चिमनियों और मालगाड़ियों के धुएं में कहीं खो जाएगा।



