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​जिंदल कंपनी की कुल्हाड़ी और माताओं का आँचल: नागरमुड़ा में आधी रात को ‘जल, जंगल और ज़मीन’ के लिए मातृशक्ति ने भरी हुंकार

रायगढ़। जब दुनिया गहरी नींद में सो रही होती है, तब एक माँ अपनी संतानों के भविष्य को लेकर अक्सर जागती है। छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिले के तमनार क्षेत्र में स्थित नागरमुड़ा गांव में भी बुधवार की आधी रात को कुछ ऐसा ही नज़ारा देखने को मिला। यह लड़ाई सिर्फ पेड़ों को बचाने की नहीं थी, बल्कि यह लड़ाई थी उस आजीविका, जलस्रोत और सांस्कृतिक पहचान की, जिसे ये ग्रामीण अपनी माँ मानते हैं।

कोयला खदानों और औद्योगिक विस्तार के नाम पर जब मशीनों का शोर नागरमुड़ा के जंगलों का सीना चीरने की तैयारी कर रहा था, तब गाँव की महिलाओं ने, अपने छोटे-छोटे बच्चों की उंगलियां थामे, आधी रात को ही मोर्चा संभाल लिया।

क्या है पूरा मामला?

​तमनार विकासखंड के नागरमुड़ा गांव में हजारों पेड़ों की प्रस्तावित कटाई को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है।

  • आधी रात का संघर्ष: बुधवार की रात जब ग्रामीणों को पेड़ों की कटाई की तैयारी की भनक लगी, तो महिलाओं, युवाओं और बुजुर्गों का हुजूम जंगल की ओर निकल पड़ा।
  • कंपनी की टीम की वापसी: भारी विरोध को देखते हुए कंपनी प्रबंधन को अपने कदम पीछे खींचने पड़े और उनकी टीम बैरंग लौट गई।
  • प्रशासन और पुलिस बल पर सवाल: खबर के अनुसार, कंपनी प्रबंधन का कहना था कि वे केवल पहले से कटे हुए पेड़ों को उठाने आए थे। लेकिन ग्रामीणों का तीखा सवाल है कि यदि मंशा सिर्फ कटे पेड़ उठाने की थी, तो आधी रात को प्रशासन और पुलिस टीम की क्या आवश्यकता पड़ गई?

“जंगल हमारे लिए केवल पेड़ों का समूह नहीं है, यह हमारी आजीविका, जलस्रोत, पर्यावरण और हमारी सांस्कृतिक पहचान का मूल आधार है।”विरोध कर रहे ग्रामीण

लुभावने वादों के बीच अडिग मातृत्व और एकता

​अक्सर विकास की अंधी दौड़ में सबसे ज़्यादा कीमत ज़मीन से जुड़े लोगों को चुकानी पड़ती है। विश्वसनीय सूत्रों के हवाले से खबर में यह भी दावा किया गया है कि कंपनी प्रबंधन (जिंदल कंपनी) द्वारा कटाई का काम निकालने के लिए क्षेत्र के कुछ युवाओं को गुमराह करने का प्रयास किया गया। उन्हें नकद राशि, बस की व्यवस्था और चंद्रपुर में ‘बकरा पार्टी’ का लालच दिया गया।

​किंतु, गाँव की मातृशक्ति और जागरूक नागरिकों के सामने ये सब चालें धरी की धरी रह गईं। महिलाओं का स्पष्ट कहना था कि यदि इसी तरह जंगल खत्म होते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के सामने जल संकट, प्रदूषण और पर्यावरण असंतुलन जैसी गंभीर चुनौतियां खड़ी हो जाएंगी।

विकास के साथ पर्यावरण संरक्षण क्यों है ज़रूरी?

​तमनार क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में कोयला खदानों और बड़े औद्योगिक संयंत्रों का केंद्र बन चुका है। इसके कारण:

  • बड़े पैमाने पर वन भूमि का अधिग्रहण हुआ है और लाखों पेड़ काटे जा चुके हैं।
  • ​अंधाधुंध कटाई से जैव विविधता प्रभावित हो रही है और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास नष्ट हो रहे हैं।
  • ​भूजल स्तर में भारी गिरावट आई है और स्थानीय जलस्रोत सूख रहे हैं।
  • ​तापमान में वृद्धि, प्रदूषण और वर्षा चक्र में बदलाव जैसी गंभीर