रायगढ़। जिले में महत्वाकांक्षी ‘भारतमाला सड़क परियोजना’ अब विकास कम और विवादों का पर्याय ज्यादा बनती जा रही है। मुआवजा वितरण में धांधली, कोल ब्लॉक क्षेत्र की जमीनों के अधिग्रहण और अमृत सरोवर योजना के तहत बने तालाबों से अवैध मिट्टी उत्खनन के बाद, अब इस प्रोजेक्ट ने सीधे पर्यावरण और वन संपदा को अपना निशाना बनाया है। ताजा और बेहद गंभीर मामला धरमजयगढ़ वन मंडल क्षेत्र का है, जहां आरोप है कि सड़क निर्माण की आड़ में वन भूमि को जमकर रौंदा गया और सैकड़ों बेशकीमती पेड़ों को जड़ से उखाड़ कर रहस्यमयी तरीके से गायब कर दिया गया।
स्वीकृत सीमा पार कर मशीनों से मचाई तबाही
जानकारी के अनुसार, धरमजयगढ़ के सिसरिंगा घाट इलाके में चल रहे निर्माण कार्य ने स्थानीय लोगों में भारी आक्रोश पैदा कर दिया है। ग्रामीणों का सीधा आरोप है कि निर्माण एजेंसी ने स्वीकृत सीमा को ताक पर रखकर मशीनों से अंधाधुंध खुदाई की। इस मनमानी में सागौन जैसे बेशकीमती और पुराने पेड़ों को बेरहमी से उखाड़ दिया गया। हैरानी की बात यह है कि उखड़े हुए ये पेड़ कुछ ही दिनों में मौके से गायब भी हो गए। आज भी घटनास्थल पर पेड़ों के ठूंठ और टूटी हुई डालियां इस विनाशलीला की गवाही दे रहे हैं, लेकिन समूल उखाड़े गए उन बेशकीमती पेड़ों का कोई सरकारी रिकॉर्ड मौजूद नहीं है।
पर्यटन स्थल की सुंदरता बर्बाद, संपत्तियों को नुकसान
स्थानीय निवासियों का दर्द सिर्फ पेड़ों की कटाई तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि काम की जल्दबाजी और बिना किसी प्रशासनिक निगरानी के, निर्माण का दायरा अधिग्रहित भूमि के काफी बाहर तक फैल गया। इसका खामियाजा न सिर्फ जंगल को भुगतना पड़ा है, बल्कि सरकारी जल स्रोतों और लोगों की निजी व सार्वजनिक संपत्तियों को भी भारी नुकसान पहुंचा है। सिसरिंगा घाट, जिसे इलाके में एक खूबसूरत पर्यटन स्थल के रूप में जाना जाता है, उसकी प्राकृतिक सुंदरता को भी इस प्रोजेक्ट की अंधाधुंध खुदाई ने गहरी चोट पहुंचाई है।
कंपनी का इनकार और वन विभाग की लीपापोती
इस पूरे गोलमाल में जब जिम्मेदार लोगों से जवाब मांगा गया, तो लीपापोती का खेल शुरू हो गया। निर्माण कंपनी प्रबंधन की ओर से प्रदीप सिंह ने इस पूरी घटना की जानकारी होने से ही साफ इनकार कर दिया।
लेकिन इस मामले में सबसे ज्यादा चौंकाने वाले बयान वन विभाग के अधिकारियों के हैं, जो आपस में ही टकरा रहे हैं। एक तरफ धरमजयगढ़ रेंजर डी.पी. सोनवानी का दावा है कि भारतमाला परियोजना के लिए चिन्हांकित पेड़ों की कटाई विभागीय प्रक्रिया के तहत ही की गई है। वहीं दूसरी तरफ, उत्पादन इकाई के रेंजर जॉन तिग्गा का बयान इसके बिल्कुल उलट है। तिग्गा का स्पष्ट कहना है कि इस प्रोजेक्ट से संबंधित पेड़ों की कटाई वर्षों पहले ही पूरी हो चुकी थी और हाल-फिलहाल में विभाग द्वारा किसी नई कटाई की कोई कार्रवाई नहीं की गई है।
उठ रहे हैं कई गंभीर सवाल
अधिकारियों के इन विरोधाभासी बयानों ने भ्रष्टाचार की बू को और तेज कर दिया है। सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि जब हाल में पेड़ काटने का कोई वैधानिक आदेश या कार्रवाई हुई ही नहीं, तो फिर निर्माण क्षेत्र से इतनी बड़ी संख्या में बेशकीमती पेड़ उखड़े कैसे और रातों-रात कहां गायब हो गए?
फिलहाल स्थानीय ग्रामीणों ने लामबंद होकर मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच की मांग उठाई है, ताकि सड़क निर्माण के नाम पर वन भूमि पर हुए इस अतिक्रमण और बेशकीमती लकड़ियों के नुकसान के लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय कर उन पर कड़ी कार्रवाई की जा सके।



